दिल्ली पुलिस के इस चेहरे को छिपाने के लिए जामिया के छात्रों को जिहादी बोला गया

दिल्ली पुलिस के इस चेहरे को छिपाने के लिए जामिया के छात्रों को जिहादी बोला गया






रवीश कुमार दिल्ली पुलिस पर जामिया की हिंसा का झूठ भारी पड़ता जा रहा है। पुलिस ने जितनी भी कहानी बनाई है वो उतनी ही सच है क्योंकि पुलिस के उन कहानियों के आगे काननू की धारा लगाने की शक्ति है। पहले कहा कि कोई गोली नहीं चली। फिर गोली चलाने की तस्वीर सामने आ गई।
अब जामिया की लाइब्रेरी के वीडियो सामने आए हैं। दुनिया के इतिहास में ऐसा दूसरा प्रसंग नहीं होगा जहां पुलिस किताब कापी के साथ बैठे छात्र और छात्राओं पर लाठी मार रही है। इस वीडियो को आप इस सवाल के साथ देखें कि क्या आप ऐसी पुलिस चाहेंगे? या आप ऐसी पुलिस चाहेंगे जो क़ानून की जवाबदेही के साथ चले।

जो नेता के हिसाब से काम करें या क़ानून के हिसाब से जनता के लिए? पुलिस के इस चेहरे को छिपाने के लिए जामिया के छात्रों को जिहादी बोला गया। आतंकवादी और मुस्लिम लीगी कहा गया। ज़ोर ज़ोर से कहा गया ताकि सच छिप जाए। क्या इस वीडियो को देखने के बाद भी उन तमाम झूठ को दोहराया जा सकता है?
दिल्ली पुलिस के अधिकारियों, जवानों को भी पहचानना चाहिए कि वो कौन से दो चार कमजोर रीढ़ के अफ़सर हैं जो दशकों कमाई दिल्ली पुलिस की प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला रहे हैं ।



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